बंद करो रोना—चिल्लाना! शिकायत छोड़ो!

बंद करो रोना—चिल्लाना! शिकायत छोड़ो! यहां कोई भी नहीं है जिससे शिकायत हो सके। यहां कोई नहीं है जिसको दोष दिया जा सके। तुम्हारे अतिरिक्त और कोई उत्तरदायी नहीं है। 


जिम्मा लो! जागो! और अपने जीवन का सूत्र अपने हाथ में सम्हालो! थोड़ी— थोड़ी रोशनी बढ़ने लगेगी। आज जो बूंद—बूंद की तरह होगी, कल सागर हो जाता है। 
संदेह छोड़ो अपने पर। हटाओ व्यर्थ संदेह के जाल को। क्योंकि संदेह से भरे तुम कुछ भी न कर पाओगे तुम कुंछं भी न हो पाओगे। बहुत लोग सिर्फ जीते हैं, कुछ हो नहीं पाते। जीते हैं और मरते हैं; उनके भीतर कुछ परम जीवन की झलक नहीं आ पाती। आ सकती थी। मगर कोई जबर्दस्ती नहीं ला सकता है। तुम ही ला सकते हो, बस तुम ही ला सकते हो।


इसलिए समय खराब मत करो—न किसी की शिकायत में, न किसी को दोष देने में, न उत्तरदायित्व टालने में, सारी शक्ति को एक बात पर संलग्न करो, एक सूत्र पर कि तुम जागने लगो! कुछ भी करो, एक बात ध्यान रखो कि जागकर करेंगे। हजार बार हारोगे, कोई फिकर नहीं; एक हजार एकवीं बार जीत जाओगे। चट्टान भी टूट जाती है। और यह चट्टान तो केवल तुम्हारी ही आदतों की है। ज्योति की धार जरा इस पर बहने दो।


*ओशो*