*धर्म को गुरु नहीं,,,*
*शिष्य चाहिए...*
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धर्म-शास्त्र जैसा कोई शास्त्र नहीं होता।
सब शास्त्र धार्मिक लोगों के लिखे हुए हैं, लेकिन धर्म-शास्त्र कोई भी नहीं। ऐसा कोई भी शास्त्र नहीं, जिसको पढ़ कर धर्म उपलब्ध हो जाए।
धर्म तो उपलब्ध करना पड़ेगा अनुभव से।
हां, शास्त्र गवाही दे सकेगा कि तुम्हें जो अनुभव हुआ है वह नानक को भी हुआ था। वह बुद्ध को भी हुआ था।
तो वह ज्यादा से ज्यादा गवाही का काम कर सकता है। लेकिन अनुभव देने का काम नहीं कर सकता।
स्वभावतः परंपरा के विरोध में कहूं कुछ,
शास्त्र को कहूं कि उससे धर्म नहीं मिलेगा, और सत्य के संबंध में कहता हूं कि उसे कभी Borrowed, उधार नहीं पाया जा सकता। वह ट्रांसफरेबल नहीं है कि मुझे सत्य मिल जाए तो मैं आपको दे दूं।
इसलिए मेरा कहना है कि धर्म के जगत में गुरु नहीं हो सकता। सिर्फ शिष्य हो सकते हैं। और शिष्य होने का मतलब है: मेरा एटिट्यूड आफ डिसाइपलशिप। सीखने का एक भाव हो सकता है भावुक आदमी में, वह सीखता है, सब तरफ से सीख सकता है। और कहीं से भी सीख सकता है, लेकिन गुरु नहीं होता।
ऐसा कोई आदमी नहीं होता जो कहता है कि मैं तुम्हें दूंगा। क्योंकि धर्म की दुनिया में प्रवेश करने के बाद मैं तो बचता नहीं, देने वाला बचता नहीं। तो कोई दावेदार तो हो नहीं सकता वहां।
हां, खोजने वाले किसी भी स्रोत से सीख सकते हैं। लेकिन शिष्य ही होते हैं, गुरु नहीं होते।
और मेरी समझ है कि गुरुओं के खयाल की वजह से पंथ और संप्रदाय खड़े हुए हैं। अगर सीखने वाले पर हमारा जोर हो तो फिर पंथ और संप्रदाय की कोई जरूरत नहीं है। कोई कहीं से भी सीख सकता है। फिर सारा जगत शिक्षा की जगह बन जाती है। और सारा जगत गुरु बन जाता है।
- ओशो....🌹
प्रेम नदी के तीरा- 4
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