*ओशो की एक प्रेम कहनी.....🌹*
💘💘💘💘💘💘💘
(मित्रो..आज मैं *एक गम्भीर विवाह-प्रस्ताव* शेयर कर रहा हूं, जो प्यारे ओशो को तब मिला था, जब वे सम्बोधि के उपरांत सागर विश्वविद्यालय सागर (मध्यप्रदेश) से दर्शनशास्त्र में पोस्टग्रेजुएशन कर रहे थे। इस वृतांत को उन्होंने चूहलबाजी [Tongue in Cheek] के तौर पर अनेक प्रवचनमालाओं में छेड़ा है, लेकिन कभी भी आद्योपरांत पूरा किस्सा नहीं सुनाया है।)
*लीजिये प्यारे ओशो के शब्दों में आप भी मेरे साथ रसास्वादन कीजिये।*
दर्शनशास्त्र विभाग में हम केवल चार ही विद्यार्थी थे- दो लड़के और दो लड़कियां। लड़के अध्यापन व्यवसाय में जाने के लिये, और लड़कियां अच्छे वर प्राप्त करने के लिये पोस्टग्रेजुएशन कर रही थीं।
इन्हीं में एक कश्मीरी लड़की थी,
जो जिला कलेक्टर की पुत्री थी, और लाल बत्ती वाली गाड़ी में आती-जाती थी। ना जाने उसने मुझ में क्या देख लिया, कि धीरे-धीरे वो मेरे निकट आने लगी, और मैं भी उसका प्रत्युत्तर उसी की भाषा में देने लगा।
पूरे भारत में प्रकृति ने जैसी सुन्दरता कश्मीरी स्त्रियों को प्रदान की है, वैसी सुन्दरता मुझे कहीं और नजर नहीं आई।
मेरा मानना है कि इसके पीछे कश्मीर में सूफीवाद का प्रभाव भी एक कारण रहा है। उनके हृदयों में सूफीज्म इतनी गहरी पैठ बना चुका है, कि उसी की आभा उनके सुन्दर चेहरों और शरीरों पर भी दृष्टिगोचर होने लगी है।
पहले मैं हॉस्टल में रहता था,
और वह बेझिझक मेरे रूम में आती-जाती थी; उसके जिलाधीश पिता के ख़ौफ से सबके मुँह पर ताले पड़ जाते थे। लेकिन मैंने असहजता की स्थिति से निकलने के लिये, हॉस्टल छोड़कर कर बाहर पोश-कालोनी में कमरा ले लिया।
लालबत्ती वाली गाड़ी से एक युवती को रोज आते-जाते देखकर आस-पड़ोस में पहले खुसर-पुसर और फिर दबी जुबान में चर्चा होने लगी।
एक दिन मैंने उसे समझाया- कि लोग हमारे बारे में क्या बातें करते हैं, कभी ध्यान देती हो?
*आपकी बातों से कभी फुरसत मिलेगी, तो और किसी की सुनूँगी।* उसने इतने भोलेपन से जवाब दिया, कि मेरी भी हंसी छूट गई।
एम.ए.फाइनल की परीक्षा समाप्त होने के बाद मैं अपने गांव लौटने की तैयारी कर रहा था, कि मेरे रूम के सामने वही लाल बत्ती वाली गाड़ी आकर रुकी, और मेरी सहपाठिनी तेजी से अन्दर आई।
“घर जा रहे हो?”
उसने मेरा बंधा हुआ सामान देखकर सवाल किया *लेकिन जाने से पहले मेरे मम्मी-डैडी से मिल लो वे आपसे मिलकर एक जरूरी बात करना चाहते हैं।*
मुझे समझने में देर नहीं लगी कि एक युवती के माता-पिता एक युवक से क्या बात करेंगे? लेकिन नकारात्मक जवाब देकर मैं उनका दिल नहीं दु:खाना चाहता था।
“आप ही बोल दो,,,
वे जो कहना चाहते हैं; मुझे ट्रेन पकड़नी है, और वक्त भी कम बचा है।”
मैंने अपनी मजबूरी जाहिर की।
“आज ही जाना जरूरी है क्या?
क्या मेरे लिये एक दिन और नहीं रुक सकते? उसने तर्क दिया।
“मुझे रुकने में कोई परहेज नहीं है,,
लेकिन रुकने की कोई ठोस वजह तो हो।
मैंने विवशता जाहिर की।
“वजह है।”
उसने रुककर मुस्कुराते हुये मेरी आंखों में झांका, *“वे आपकी और मेरी शादी की बात करना चाहते हैं।”* उसने ठोस वजह बताई।
“प्लीज मुझे गलत मत समझना,,
*मैं तुमसे विवाह नहीं कर सकता।*
मैंने अपना पक्ष रखा।
“क्यूँ? क्यूँ? क्यूँ?”
उसे मेरी बात पर भरोसा नहीं हो रहा था।
*“क्योंकि मैं तुम्हें प्यार करता हूं।”*
मैंने समझाने की कोशिश की।
लेकिन वह उठ खड़ी हुई, क्योंकि वह मेरा स्वभाव जानती थी, कि मेरी ना को हां में बदलना उसके वश के बाहर था।
*“ये भी कोई बात हुई?”* आंसूओं को छिपाते हुए, वह इतना कहकर तेजी से बाहर खड़ी कार में जाकर बैठ गई। मैं उसे समझाने के लिये जब तक बाहर आया, उससे पहले ही उसकी कार दृष्टि से ओझल हो चुकी थी।
वह चाहती तो अपने पिता के ऊंचे ओहदे का फायदा उठाकर मुझे परेशानी में डाल सकती थी। लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया; और एक बार फिर उसने अपने कश्मीरी स्वभाव के अनुसार, सूफियों के अमर कथन *“जो प्रभु की इच्छा; सो अपनी इच्छा”* में निष्ठा होने का प्रमाण दिया।
मैं गांव लौट गया,
और छ: महीने बाद श्रीनगर के पते से मुझे अपनी सहपाठिनी के विवाह का निमंत्रण-पत्र डाक द्वारा प्राप्त हुआ।
मैंने शुभकामनाओं के साथ एक साहित्यिक भेंट डाक द्वारा उन्हें भेज दी।
जब भी मैं दिल्ली में ध्यान-शिविर लेता, तो वह उसमें अवश्य सम्मिलित होती थी।
एक दिन उसने अपने वैवाहिक जीवन की हक़ीकत शेयर करते हुए कहा, *“अच्छा हुआ, जो आपने मुझसे शादी नहीं की; क्योंकि जैसा व्यवहार मेरे पतिदेव कभी-कभी मेरे साथ करते हैं, अगर आप भी वैसा ही व्यवहार करते, मैं तो जीते-जी मर जाती!”*
*“आप दोनों अपवाद नहीं हो, यही घर-घर की कहानी है।”*
मैंने कड़वा सच समझाया।
एक बार सर्दी के मौसम में मैं दिल्ली में ध्यान शिविर ले रहा था, और मेरी पूर्व सहपाठिनी मेरे बेड के पास मेरे कम्बल में पैर छिपाये एक कुर्सी पर बैठी थी। तभी एक पत्रकार ने शिविर-समाचार के साथ मेरा एक फोटो लेने का आग्रह किया, तो मैंने बिना कैमरामैन की नीयत पर शक किये, हां बोल दिया। लेकिन वह अपने उच्चाधिकारी पति के साथ रहकर पीत-पत्रकारिता की घटिया सोच से वाकिफ़ थी; इसलिये उसने अपना चेहरा कैमरे के सामने से दूसरी ओर घुमा लिया।
और वही हुआ, जिसकी उसे आशंका थी। मेरे कम्बल में छिपे उसके पैर अख़बार की सुर्ख़ी बन गये। उसके बाद मेरे मना करने के कारण, उसने दिल्ली की बजाय कश्मीर में आयोजित ध्यान-शिविरों में भाग लेना शुरु कर दिया।
उसके पति ने उसे कभी भी नहीं रोका, बल्कि प्रशासनिक कार्य से फुरसत मिलने पर कभी-कभी वे भी आने लगे।
*मैं उसकी पहचान गुप्त रखूंगा,,*
क्योंकि अब वह एक भारतीय प्रशासनिक अधिकारी [IAS] की पत्नी, दो बच्चों की मां व सफल गृहिणी है।
*प्रेम वनवे ट्रैफिक नहीं है, इसलिये एक दूसरे के आत्मसम्मान की रक्षा करना दोनों का सांझा दायित्व है।*
[ संकलित व सम्पादित ]