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*फिक्र छोड़ो, मस्त रहो*
दुःख उधार का है, आनंद स्वयं का है। आनंदित कोई होना तो अकेले भी हो सकता है; दुखी होना चाहे तो दूसरे की जरुरत है। कोई धोखा दे गया; किसी ने गाली दे दी; कोई तुम्हारे मन की अनुकूल न चला - सब दुःख दूसरे से जुड़े है। और आनंद का दूसरे से कोई सम्बन्ध नहीं है। आनंद स्वस्फूर्त है। दुःख बाहर से आता है, आनंद भीतर से आता है...
*- ओशो*