*प्रेम को समझो.....❣*
मैं निरंतर प्रेम की बात करता हूं।
प्रेम शब्द का उपयोग करना अंगार से खेलने जैसा है,
मैं जिस प्रेम की बात करता हूं ।
बहुत संभावना है तुम वही नहीं समझोगे तुम वही प्रेम समझ लोगे जो तुम समझ सकते हो
*मैं जब प्रेम की बात करता हूं, तब प्रार्थना की बात कर रहा हूं।*
तुम जब प्रेम शब्द सुनोगे, तत्क्षण तुम कामना की और वासना की बात समझ लोगे तुम अपना प्रेम समझ लोगे
अगर तुम्हारे प्रेम से ही मोक्ष हो सकता था, तब तो फिर मेरे पास आने की कोई जरूरत नहीं थी वैसा प्रेम तुम कर ही रहे हो उससे मोक्ष नहीं हुआ है, उससे संसार ही निर्मित हुआ है, उससे तुम जरा भी ऊपर नहीं गये हो, उससे तुम नीचे गिरे हो उससे तुम भटके हो, वही तो तुम्हारा भटकाव है
लेकिन मेरी बात सुनकर हो सकता है।
तुम अपने पुराने ढांचे के लिए सहारा खोज लो और तुम सोचो, मैं तुम्हारे प्रेम की बात कर रहा हूं
*तुम एक बात सदा ही स्मरण रखना,,,*
मेरे शब्दों को तुम कभी अपनी भाषा में अनुवादित मत करना, अन्यथा चूक हो जाएगी तुम अपने को जरा अलग ही रखना और जब भी मैं उन शब्दों का उपयोग करूं जिनके उपयोग करने के तुम भी आदी हो, तो बहुत सावधानी से सुनना, क्योंकि भूल होने की बहुत संभावना है।
तुम वही अर्थ डाल दोगे जो तुम्हारा अर्थ है और वहीं चूक हो जाएगी तुम कुछ सुन लोगे जो नहीं कहा गया था तुम कुछ समझ लोगे जो प्रयोजन नहीं था कुछ का कुछ हो जाएगा अनर्थ होगा, अर्थ नहीं होगा
हृदय की ग्रंथि के नीचे भी एक प्रेम है।
पाशविक प्रेम, अंधा प्रेम, वासना, देह का प्रेम; प्रेम नाममात्र को है।
प्रेम कहना भी नहीं चाहिए
शोषण है एक—दूसरे की देहों का अपने को भुलाने के उपाय हैं, मूर्च्छा है, मदिरा है
एक प्रेम है,,,
जो हृदय की ग्रंथि के ऊपर है।
वहां प्रेम अति कोमल है।
वहां प्रेम पराग जैसा है। वहां प्रेम पदार्थ नहीं है, सुगंध जैसा है, सुवास जैसा है
मुट्ठी बाधोगे तो पकड़ में नहीं आएगा मुट्ठी बांधी तो चूक जाओगे वहा प्रेम किसी और आयाम में प्रवेश करता है
वहां तुम देह को नहीं चाहते
वहां देह से कुछ प्रयोजन न रहा वहां मन की चाहत पैदा होती है।
और धीरे— धीरे मन की चाहत से भी पार हो जाते हो प्राणों का प्राणों से मिलन होता है। शरीर तो अलग— अलग हैं। मन इतने अलग नहीं और आत्मा तो बिलकुल अलग नहीं है।
मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूं।
वह ऐसा प्रेम है, जहां तुम्हें इस सारे अस्तित्व में एक ही प्राण का स्पंदन अनुभव होता है। जहां पत्ते—पत्ते में, जहां कंकड़—कंकड़ में एक ही प्रेम, एक ही ऊर्जा तुम्हें प्रवाहित मालूम होती है और तुम बूंद की तरह इस विराट सागर में डूबने को आतुर हो जाते हो
*प्रार्थना का यही अर्थ है*
*ओशो...❣*
अष्टावक्र महागीता -6 प्रवचन–83